चक्का चलाबो

#01#मेराबचपन#चक्का#चलाबो

बच्चपन में गर्मियों की छुट्टियों में दोपहर में हमे कभी निंद नही आती थी और हम सुभा से ही घर से बाहर गलियो में खेलने भाग जाया करते थे। जब खेल कर दोपहर में घर को लौटते तब खाने के साथ माँ कि डाट भी खानी पड़ती थी,’तोला समंझ नही आये का कत्तेक बार केहे हो की घाम म मत घूमे कर अब निकलबे न तोर हात गोर ला तोड़ दुहू’ औऱ कभी कभी तो मार भी पड़ती थी। पर हम कहाँ सुनने वाले दोपहर में माँ के सोते ही हम फुर्र हो जाते । गर्मियों के दिनों में गलियों में घूमते हुए खेले जाने वाला मेरा पसन्दीदा खेल होता था, ‘चक्का चलाना’ साईकल की पुरानी टायर पंचर वाले कि दुकान से तब उठा लाते जब दोपहर में वो भी सूत जाता। इस पर भी हम संगवारी दोस्त खुसपुसाते, ‘एला ते धर न भाई,एला में धरहू,एला मे पहिली देखें हो’ ऐसा कहते वही पे लड़ना चालू करदेते थे कि कौन सा चक्का जादा अच्छा है और नया दिख रहा है इस को ले कर रस्ते भर नोक झोंक होती रहती थी। जब सब को अपना पसंदीदा चक्का मिल जाता तब बारी आती उसे साफ कर सजाने धजाने की। मैं अपने चक्के को अपनी गाड़ी ही समझता तक था इसलिए उसे सजाने का मेरा अंदाज़ मेरी कलात्मक पसंद होती थी। “अब भाई मोर खाली चक्का च ला चलात थोड़ी रबो ओकरे सती हमन चिरई घलो मारे ला जात रहे हन,इमली घलो तोड़न, बोइर घलो तोड़न,तब तो दूर-दूर चक्का चलाएक जा के कोई मतलब बनहि ओखरे पायके गुलेन ला घरो चक्का मा खोच देवत रहेन”। चक्के में गुलेन को फंसा दिया करते थे जिसे हम पंछियो पर तो कभी किस वस्तु पर निशाना साधते थे। चक्का चलाना केवल खेल नहीं था इससे आप के शरीर की क्षमता पता चलती थी कि आप गर्मियों की कड़ी धूप में नंगे पांव कितनी दूर और कब तक टिक पाते हो, बचपन के इस तरह के खेल से मेरा शरीर काफ़ी कठिला हो गया था। इन खेलों से आप का शरीर मजबूत भी होता है जब आप बिना सोचे कितनो किलोमीटर आप युही दौड़ दिया करते थे। इस तरह के खेल विलुप्त हो चुके है। दूर तक कही घूम कर आने के बाद गलियों में एक ऐसी जगह होती थी जो नीम,पीपल या करन के वृक्ष की छांव में होती उस जगह हम रुकते और शाम होने तक वहीं रहते। हम उन पेड़ो की छाओ में नहीं बल्कि पेड़ो पर ही अपना समय गुज़ारते। मेरा पसंदीदा पेड़ उनदिनों करन का हुआ करता था क्यों कि वह पेड़ उचाई में ज्यादा बड़ा नही होता है और खास बात की उस पेड़ को खरोच कर आप कुछ उकेरते हो तो वह कुछ दिनों बाद उभर जाता है। इसी कारण हम सब दोस्त मिल कर अपनी अपनी पसंदीदा टहनियों में बैठ जाते और अपना नाम उकेरने लग जाते फिर उसे कुछ दिनों बाद जब देखने जाते तो हमारा नाम भी अब उस पेड़ का हिस्सा बन चुका होता। शाम होते ही हम सब थक चुके होते और सीने में एक डर लिए घर की ओर जाते ये डर इस बार माँ के डांटने का नही है डर अब इस बात का होता था कि अब हमें जो गर्मियों की छुट्टियों में होमवर्क करने को दिया गया है उसे करने बैठना है माँ भी बड़े प्यार से कहती, “कि चल अब दिन भर खेले किंजरे हस ते चल अब चुप चाप पढ़े ला बइठ नही तो फेर मैं तोर पाप ला बताहु अभी आवत हो ही उहू हा”,बस यहां से उदासीनता शुरू हो जाती जब तक होमवर्क खत्म नही होता।औऱ फ़िर समय आता टी.वी देखने का जिसमे,” मोला टेटकू-मेटकु(कार्टून) देखे में अब्बड़ मजा लागता भाई”।

इन बिताए गए बचपन के यादगार खुशनुमा पल अब वापिस नहीं आ सकते इस से जुड़ी यादे बहुत है इस कहनीं मे जो मेरे साथ हुआ करते थे सब की ज़िंदगी भी बदल गई हैं लेकिन बस ये यादे रह गई हैं अपनी इन बातों से मैंने इन्हें फिर से ज़िन्दा करने की कोशिश की आगे और भी कहानियां है बचपन की जिन्हें इसी तरह शब्दो मे पिरोता रहूंगा।

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