उलझन

लो फिर वो वक़्त आया वो जाने को थी

मैं ठहरा सा था ।

वो अलविदा कहने को थी,मैं रुक जाने को था।

उसे समझ ना थी,मैंने न समझाना चाहा ।

उसे एहसास न हुआ, मैं ख़ामोश रह गया ।

वो बेपरवाह आज़ाद परिंदा थी, मैं उसका ठिकाना न हुआ ।

वो तो पहले से ही कहीं थी गुम, मैं उसमे गुम होना चाहता था ।

वो तो सतरंगी इन्द्रधनुषी थी,मैं गुमनाम बदरंग बादल था ।

बातों से दिल के मेरे वाकिफ़ सभी थे,इस बात का पता न उसको था न मुझको था ।

करीब तो थे मगर कोसो दूर भी थे ।

आदत तो थी इसकी इस तरह होने की, मगर चाहने का ये फ़ितूर कम ना हो पाया ।

तालाश मुझको ख़ुश-ख़ुशी की थी, हस-हंसी भी मिली ।

मग़र इस क़ाबिल तो कभी मैं ही न था ।

एक और इश्क़ सिमट गया

एक और कहानी दफ़न हुई

Image Source Google
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