सफ़रनामा

यह किसी के साथ भी हुआ होगा

अक्सर यह देखने में आता है कि रेल में यात्रा के दौरान महिलायें बैठने के लिए सीठ का जुगाड़ कर ही लेती है

मैं अपने घर के लिए वर्धा से दुर्ग के लिए सुबह 9.38 की ट्रेन से चल पड़ा । मुझे मेरी सीठ मिल गई ट्रेन समय से पहले चल रही थी इस वजह से नागपुर पहुंचते ही ट्रेन लगभग आधा घंटा और वह खड़ी हो गई मेरे सामने एक महिला सोई हुई थी थोड़ी देर बाद वह उठ गई और कुछ समय बीतने के बाद वह अपने पति से सीठ को लेकर कुछ बात करने लगी उनकी भाषा मुझे समझ नहीं आ रही थी लेकिन इतना समझ मे आगया था कि वह दोनो सीठ को लेकर कुछ बात कर रहे थे । इस भीच वह महिला फ़्रेश हो कर आई और सीठ पर बैठे हम लोगो से सवाल किया कि क्या आप लोगो की यह पर कोई सीठ है ? मैंने कहा जी हां मेरी सीठ है यहा पर, महिला बोली क्या आप आगे वाले सीठ नम्बर 9 पर जा के बैठ जाएंगे, मैंने पूछा कि सीठ लोअर , मिडिल है या ऊपर है जवाब में महिला ने कहा लोअर सीठ है जवाब सुनते ही मैंने हामी भर दी। इनका परिवार मूल रूप से दक्षिणा भारत से था जो अपने पति और एक बेटे के साथ सफर कर रहा था। जहा इनका महिला का बेटा बैठा था वह मुझे जाने को कहा गया था।

इसी के साथ वही पर एक और महिला विराजमान थी शायद इनका सीठ कन्फर्म नही हुआ था इस वजह से वह एडजस्ट कर वही बैठी हुई थीं । ये महिला मेरे क्षेत्र से थीं गांव से होने की वजह से वह थोड़ी संकोच के साथ बैठी थी क्यों कि उनका अपना सीठ नही था।

ये दोनों महिला एक ही सीठ पर बौठे थे मेरे क्षेत्र की महिला के पति यहां वहा कही वो भी खड़े खड़े एडजस्ट करते नज़र आ रहे थे वहीं दक्षिण भारत की महिला अपने पति के साथ ही बैठीं थी । इन्हों ने खाना मंगाया और पति खाना खाने लगा और पत्नी इंतज़ार करने लगी,कुछ देर बाद पति के खाना खत्म कर देने के बाद पति अपने बेटे को बुला लाया ऐसा इसलिए क्यों कि अब तक मैन सीठ बदली नही थी और उनका बेटा वही दूसरी सीठ पर ही बौठा था । अब वह भी यहां आगया और पिता अपने बेटे की सीठ पर जा कर बैठ गए।

इन सब के बीच मेरे क्षेत्र की महिला को वह सीठ छोडनी पड़ी इससे पहले मेरे बाजू में बैठे एक बुज़ुर्ग उठ के कही चल दिये इस वजह से उस महिला मेरे बाजू में बैठने का मौका मिल गया।

उधर उस सीठ में महिला अपने बेटे को खाना परोसा चुकी थी और वह खाना खाने लगा और वह महिला अपने बेटे को खाना खाते निहारते बातें करने लगी मुझे उनकी भाषा समझ मे नही आ रही थी इसलिए न जाने वो क्या बात कर रहे थे ख़ैर, मेरे बाजू में बैठी महिला काफी समय से नींद के साथ संघर्ष कर रही थी बैठे बैठे ही सो गई इस बीच अचानक वह लुड़क कर मेरी ओर लेट गई मै थोड़ा और सरक कर उससे सोने के लिए थोड़ी जगह दे दी ।अब यह महिला आराम से सो चुकी हैं।

सामने वाली सीठ में बेटे के खाने के बाद महिला ने उसी थाली में से बेटे द्वारा छोड़े गए खाने को वह खाने लगी यह पहले से तय था कि बेटा थोड़ा खायेगा ओर फिर माँ उसी मेसे थोड़ा खायेगी। खाना खाने कर बाद दोनों माँ बेटे सो गए बेटा मिडिल वाली सीठ पर और माँ लोअर सीठ में ।

नींद तो मिझे भी आ रही थी पर मैं कैसे उस महिला को अब उठा दूं जो भारी नींद में सो रही है वही दक्षिण भारतीय महिला के पति को भी तो नींद आ रही होगी लेकिन उनके बाजू भी कोई महिला विराजी हुईं है।

महिलाओं को इन सब में सुविधा हों ही जाती है ना जाने कब हमे कोई इस तरह से ट्रीट करेगा ।तो बस ये ही था सफर जो अब भी जारी है।

हाय तौबा नींद….👍

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