क्या ऐसा भी होता है ।

मेरा नाम मैत्री है। मेरी उम्र 21 वर्ष है। मैं आज यहां आप सभी से अपनी परेशानी साझा करना चाहती हूं। मुझे परेशानी है अपने माता पिता के व्यवहार और सोच से। मेरे माता पिता दोनों शिक्षक है और इस आधुनिकता और रफ़्तार के दौर में मुझे अभी तक उन्होंने मोबाइल के इस्तेमाल से वंचित रखा है। मैं बी.ए. द्वितीय वर्ष की छात्रा हूँ और मुझे यह समझ नहीं आता कि वे मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं? बहुत ही ज़रूरी काम आने पर ही माँ मुझे अपने मोबाइल से कॉल करने की अनुमति देती है। सोशल मीडिया के आज के इस दौर में मेरी माता जी भी इसका उपयोग करती हैं, लेकिन मुझे इससे कोसों दूर रखा गया है, जबकि मुझे इसकी ज्यादा जरूरत महसूस होती है इस युवा अवस्था और छात्र जीवन में। बहुत ही आवश्यक कार्य के लिए ही मैं माँ के व्हाट्सएप का इस्तेमाल कर पाती हूँ। हमारे कॉलेज में सारे दोस्तो ने पढ़ाई से संबंधित डिस्कशन करने और महत्वपूर्ण जानकारियां और नोट्स आपस मे शेयर करने के इरादे से एक ग्रुप बनाया था। जिसमें लड़कियां और लड़के सभी जुड़े हुए थे। इस बात को मैने माँ से कहा कि मुझे भी इस ग्रुप में जुड़ना है जिस से मुझे पढ़ाई में मदद मिलेगी, तो उन्होंने पहले मुझे घूरा और फिर कहने लगी कि तेरे पापा से पूछ कर बताती हूँ और तत्काल पिता जी को कॉल कर दिया और कुछ देर बात करने के बाद जवाब ना में आया। मुझे इस प्रकार से मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया जा रहा है, जिसका विरोध भी शायद मुझे करने की अनुमति नही हैं। हमेशा से मुझ पर शक किया जाता है, शक भरी निगाहों से मेरे अपने माता पिता हर वक्त मुझे देखते है। मुझे किसी चीज़ की आज़ादी नही दी गई है, यहां तक कि मुझे मेरे करियर के लिए विषय का चुनाव भी नही करने दिया गया। मैं एयरहोस्टेस बनना चाहती थी। माँ ने मुझे मजबूरन दूसरे विषय का चुनाव करवाया, यह कह कर कि इस में ज्यादा और सुरक्षित स्कोप है। मैंने वो भी किया उनके कहने पर, लेकिन नतीजा यह हुआ कि मैं उस वर्ष परीक्षा में फेल को गई। मुझे इस के बारे में घर मे बताने से बहुत डर लग रहा था। कई दिनों तक मेरे गले से खाने का दाना तक नही जा रहा था। एक दिन हिम्मत कर के मैंने उन्हें बता दिया। मेरी जम के आलोचना हुई। खरी खोटी सुनाया गया मुझे, डांट धप्पड का सामना करना पड़ा जिसकी वजह से मैं घबराहट और डिप्रेशन की शिकार हो गई, जो अभी मेरे अंदर बरकरार है। मेरी माता पर हमारे बाकी के रिश्तेदारों और इनके दोस्तों का बहुत असर होता है, अगर इनमें से किसी के बच्चे ने कुछ कर दिया तो किसी न किसी बहाने से मुझे उससे सम्बंधित बाते बोल के ताने मारेंगी कि उनका लड़का ऐसा कर रहा है, उनकी बेटी तो ऐसी है, तू भी अब से वैसे ही करेगी। हद होती है कि किसी के शरीर, दिमाग और आत्मा के साथ खेलने की और वे ये सब करते कभी थकते नही हैं, उन्हें कभी ये एहसास तक नही हुआ कि मुझे क्या चाहिए? मैं कैसे रहना चाहती हूँ? वो बस दूसरो की बातों को लेकर मुझ पर थोपना जानते हैं लेकिन अब मैं टूट चुकी हूँ, मैं थक गई हूं कभी भी ये नही जान पाई कि मेरी खुद की क्या इच्छा और ख्वाइश है, क्योंकि इनका लगाम तो मेरे माता पिता के पास है । आज जब कोई पूछता है, तुम क्या चाहती हो? क्या पसन्द है तुम्हें? तो मेरे पास इनका कोई ठीक-ठीक जवाब ही नहीं होता, क्योंकि मेरे दिमाग में इन सब का जवाब डाला ही नही गया हैं। मेरा व्यवहार बाकियों से अलग था। अकेले रहना दोस्ती सीमित रखना बिना किसी से संवाद किये कई दिनों तक रहना यह आम बात हैं। मैं खुद को किसी पहाड़ के नीचे दबा महसूस करतीं हूँ लगता है, जैसे किसी ने मुझे अपने पैरों तले दबा दिया है। मेरा दिमाग विकास की ओर जा ही नही रहा है। मानो मैं एक जिंदा लाश की तरह बस इशारो में जी रही हूँ, मुझे इन सब से मुक्ति चाहिए। मेरा पढ़ाई में मन नही लगता, ना खाने-पीने में, मुझे तो बस घर की नौकरानी बना कर रख दिया गया है। जिसे अपनी जिंदगी जीने की आज़ादी नही। सुबह से घर का काम करो बर्तन धोना, झाड़ू पोछा करना, खाना बनाना और कुछ बच जाए बाकियों के खाने के बाद तो पेट की भूख मिटा लेना। बेटी को तो बोज ही समझा जाता रहा है और मेरे माता पिता के लिए मैं तो वैसे भी किसी काम की नहीं इसलिए वो मेरी शादी के लिए अभी से लड़का ढूढ़ना शुरू कर दिए हैं, मैंने ठीक से अभी तक घर से बहार कदम रखा नही है, मैं खुद को जानना चाहती हूँ, खुद को समझना चाहती हूँ, जिसका मुझे अवसर दिया ही नही गया कभी, मैं खुद के लिए वक्त चाहती हूँ, दुनिया देखना चाहती हूँ । मैं अपने माता पिता से तंग आ चुकी हूं, यहां नही जा सकते, वहां नही जा सकते, ये नही कर सकते वो नहीं कर सकते, उनके प्रति मेरे अंदर अब घृणा कि भावना जन्म ले चुकी है। उनके प्रति माँ और पिता जैसा कुछ भाव ही नही रह गया है। भीतर मानो जैसे मैं शून्य हो चुकी हूँ। मुझे लगता है जैसे मैं कही भाग जाऊ उनसे दूर। क्या मेरे जीवन ऐसे ही बीतने वाला है? क्या मैं ऐसे ही छोटी सोच रखने वालो के कैद में अपना जीवन व्यतीत करने वाली हूँ ? क्या मुझे मेरा जीवन अपनी तरह जीने को नहीं मिलेगा? मैं एक लड़की हूँ, कल को मेरी शादी होगी, इसका मतलब मैं एक कैद से दूसरे कैद में जाने वाली हूँ। बस ये ही रह गया है क्या अब मेरे जीवन में ? इन सारे सवालों के जवाब जब मुझे मिल जाये तो शायद मेरा जीवन सम्पूर्ण होगा।

कई ऐसे अनकहे किस्से है जो हमारे बिच होते हुए भी हमें नज़र नही आते । इस कहानी का मकसद उन सभी माता पिता से अनुरोध करना है और उन्हें आयना दिखाना है की, वे अपने बच्चो के साथ ऐसा बरताव न करे इस कहानी से कुछ सीखें और बदलाव की दिशा में देर न करे और शीघ्र कदम उठाए, वरना शायद आप को इसका मूल्य अपनी संतान खो कर चुकाना पड़ सकता है ।

#नागेन्द्रसाहू #untoldstories#प्रेम#स्नेह#ख़ुशी

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