बेचैनी

मै नहीं मानता ये रस्म कसम ,सब ढकोसला है इंसान पैदा सिर्फ इसलिए हुआ था कि वो जिए और उसके 3 प्रमुख काम थे ,खाना , सोना और प्रजनन करना। गलती की उस इंसान ने जो उसने नई चीज़ों को खोजना शुरू किया गलती की उसने की वो इस दुनिया को जाने निकल पड़ा ,गलती की उसने जो वो बोलना सिखा, क्यों की अब जब हम ये सब सोचते है तब समझ में आता है कि है यारो ये सब एक गलती ही थी ।

आज भी अफ्रीका के जंगलों में आदिवासी जनजाति के लोग रहते है जो इस 21वि सादी के बंधनों से आज़ाद जिंदगी जी रहे है

न कोई रसम न कोई अंध विश्वास , उनके खूद के बनाये सटीक नियम वाही सही। उनको कौन बताये अब ये बाइबिल, महापुराण, भगवत गीता के कहानिया और उनके उपदेश ,क्या वो नहीं जी रहे ,किसी तरह की कोई बंदिश नहीं की ये मानो वो मानो। अरे वाही लोग सब सही और खुशनुमा ज़िन्दगी जी रहे है गलती कर दी हमने जो होगये इस युग में पैदा जहा पर न है खुले विचार इंसानियत के जहा लगा दी जाती है पैदा होते ही बेटियो पर बंदिशे ।

जहा समाज के नाम पर हो रहे कत्लेआम न करसकते तुम किसी और से अपनी दिल की पहचान।

सब है ये ढकोसला नाम खाली रीती रिवाज़, जब पैदा हुआ इंसान न था कोई इन सब का माइ बाप

कब समझे गया इंसान खुद की इस रचना को, जो रचा गया है किसी अनसुने अनदेखे अनकहे अनजाने रौशनी के द्वारा जो अब सिमट रहा हम सब के भीतर और पनप रहा एक विज्ञान सारा।

खेल है ये उस रौशनी का जो खेला जा रहा विज्ञान संग, न जाने कौन सत्य कौन है झूठा यहाँ।

लेकीन जीतेगा वही जिसके भीतर छुपा तथ्य सारा।

आगे बाकी है……..

#नागेन्द्र#प्रेम#स्नेह#ख़ुशी

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