मौत की ज़िन्दगी और ज़िन्दगी की मौत

मौत अकेला किसी दिन निकल पड़ा दोस्ती की तलाश में वो जा पहुँचा, चलता जिसकी ओर हाथ बढ़ा के, वो चल बसता इस दुनिया से। मौत ढूंढ रहा दोस्त जा पहूँचा बच्चों के बीच, खेल रहा एक बच्चा झूले पर बढ़ा के दोस्ती का हाथ मौत ले गई छीन ज़िन्दगी उसकी। हैरान मौत जाता है दूसरी ओर कहीं कोई तो मिला ले हाथ दोस्ती का, दिखती है एक चुलबुली लड़की जा रही अपने सहेलियों संग, मौत ने बढ़ाया हाथ दोस्ती का और फिर ले गई ज़िंदगी किसी की । उदास हो गया मौत अपने हालत पर अपने कर्म से होगया रुसवा, चारों तरफ नज़र आ रहा करने हर कोई शिकवा । भटकते-भटकते मिला एक व्यक्ति ऐसा जो लगा उसे अपनो जैसा ,जाकर करीब हो गया खड़ा उसके, ना कुछ बोल सकता ना कुछ कर सकता बस व्यक्ति को देखता रह गया, ढूंढता मौत अपनी खुशी उसमे खड़ा वो रह गया। किया हर जगह उसका पीछा मौत ने, पाया उसका परिवार जो रहता हरदम खुशाल, रहता साथ उस परिवार के इर्दगिर्द ना मिली जगह उसे कही, तड़पता राह गया मौत पाने को अपनापन ना मिली यारों उसे जगह उस परिवार में, आया मंज़र वो लम्हा जिसका था इंतज़ार मौत को, छोड़ गए सभी उस इंसान को, कर गए पराया जब ना रही कीमत उसके जान की, बचा जो केवल एक रास्ता थी दोस्ती मौत की, जा पहूँचा वह इंसान करीब मौत के लेने अहसास उसके स्पर्श का। ना चाहते हुए भी होने लगा दूर मौत उस इंसान से, था जो उसे पता ना राह पाया अब तक कोई संग उसके, लेकिन थी ख्वाहिश अब उस इंसान कि, चाहत करने लगा वो इंसान मौत कि लगा लिया गले मौत को कर दी पूरी इच्छा मौत की,और छोड़ गया वह इंसान संसार को राह गया मौत फिर से अकेला, पा के बरसों की तपस्या का परिणाम चंद लम्हो का इकरार, चल दिया आगे कहीं पाने फिर चंद लम्हो का प्यार ।

#नागेन्द्र#प्रेम#स्नेह#ख़ुशी

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