स्वार्थ,सम्बंध और सत्य

तुम मेरे क्या काम आ सकते हो या मैं तुम्हारे किस काम आ सकता हूँ, ये दुनिया मतलब की है और मतलब पर ही टिकी! ये ही सच है जिस के ज़रिए हम अपनी बात या संबंध स्थापित कर सकते है या इससे आगे बढ़ा सकते है। ये ही हर रिश्ते की या किसी सम्बंध की नींव है जो इसे बल प्रदान करता है। संबंधों का गहरा ज़ख़्म या कहे कि एक अनुभव है जो ये बातें सीखाता है।

साफ और सच धारणाओं को रख के जो संबंध बनते है वो आप को बहुत कम देखने को मिलेंगे क्यों कि अधिकतम रिश्ते केवल और केवल स्वार्थ पर निर्भर है जो रिश्ते कई सालों से चले आ रहे है वो भी टूट जाते हैं! जब उनका आप से कोई मतलब नही रह जाता या उनका स्वार्थ पूर्ण हो गया हो और उनको आप से ऊंचे दर्जे के लोग जो आप से अव्वल हैं, वो उनका दामन थाम लेते हैं बिना आप को सूचित किए। बात स्वार्थ की आती है और आये भी क्यों न इंसान जीवन का निर्वहन अपनी ही ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ही तो कर रहा है। हर कोई अपनी सफलता चाहता है भले इसके लिए किसी का दिल टूटे तो टूटे, अपना काम निकलना चाहिए और ये ही कटु सत्य है इसे बदला नही जा सकता न ही कोई बदल सकता है किसी न किसी रास्ते सीधे तौर पे या अप्रत्यक्ष रूप से स्वार्थ जुड़ा रहता है इससे कोई मने या न माने या शायद उससे भी न पता हो कि उसे उन सबंधित संबंधों से किसी प्रकार का लाभ हो रहा है वह लाभ व्यक्तिगत सवेंदनशील भावनाओ से भी जुड़ा हो सकता है जिसका अभास आसानी से नहीं पहचाना जा सकता है।

निष्कर्ष ये निकलता है कि संबंध स्थापित करने के लिए आप के पास सामने वाले के स्वार्थ की वस्तु या स्त्रोत होना आवश्यक है।

#नागेन्द्र#प्रेम#स्नेह#ख़ुशी

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