देखा भी नहीं..

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एक तेरी कमी है…

जब जब देखता दुलार किसी का
जब जब सुनता कहानी किस्सा तेरे प्यार का
आंखों से बचपन की बेबसी जवानी में निकल आते है
सब है साथ एक तू ना था
सारी दुनिया हैं एक तू नही
सारी खुशियां है पता नही तेरा कहीं
कोसता अपने आपको अपनी की हुई उन दिनों की सारी गलतियों पर,
मेहरबानी तेरी इतनी की दी तूने ये ज़िन्दगी ठीक है,मगर तेरे बिना जीने का मकसद तो बता के जाता।।
हर सीढ़ी ज़िन्दगी की भूला के चढ़ा हू तुझको
मंज़िल का पता तो बता के जाता।
हर त्योहार पर आज भी वैसे ही रस्मे निभाता हूं
जो तुमने सिखाए
दिखाए थे जो सपनें तुमने अब न जाने कब देख पाए ।।
दोस्त करते बाते अपने पापा की
कहते कई बातें अपने पापा की
सुन चुप चाप ये सोचता मैं की ‘अच्छा हा यार ! पापा भी तो होते है इनके ।।

एक हिस्सा ज़िन्दगी का खाली पड़ा है ऐसे जैसे कोई था कभीं वहां, ढूंढ ढूंढ तेरा रास्ता गुम होगया हूं ।।

मिलता कभी कभी सपनो की अंधेरी बस्तियों में या दिखता कभीं धुंधली तो कभी साफ यादों के आइनों में ।।

#papa#love#dedicated#peace#happyness#missyou

चक्का चलाबो

#01#मेराबचपन#चक्का#चलाबो

बच्चपन में गर्मियों की छुट्टियों में दोपहर में हमे कभी निंद नही आती थी और हम सुभा से ही घर से बाहर गलियो में खेलने भाग जाया करते थे। जब खेल कर दोपहर में घर को लौटते तब खाने के साथ माँ कि डाट भी खानी पड़ती थी,’तोला समंझ नही आये का कत्तेक बार केहे हो की घाम म मत घूमे कर अब निकलबे न तोर हात गोर ला तोड़ दुहू’ औऱ कभी कभी तो मार भी पड़ती थी। पर हम कहाँ सुनने वाले दोपहर में माँ के सोते ही हम फुर्र हो जाते । गर्मियों के दिनों में गलियों में घूमते हुए खेले जाने वाला मेरा पसन्दीदा खेल होता था, ‘चक्का चलाना’ साईकल की पुरानी टायर पंचर वाले कि दुकान से तब उठा लाते जब दोपहर में वो भी सूत जाता। इस पर भी हम संगवारी दोस्त खुसपुसाते, ‘एला ते धर न भाई,एला में धरहू,एला मे पहिली देखें हो’ ऐसा कहते वही पे लड़ना चालू करदेते थे कि कौन सा चक्का जादा अच्छा है और नया दिख रहा है इस को ले कर रस्ते भर नोक झोंक होती रहती थी। जब सब को अपना पसंदीदा चक्का मिल जाता तब बारी आती उसे साफ कर सजाने धजाने की। मैं अपने चक्के को अपनी गाड़ी ही समझता तक था इसलिए उसे सजाने का मेरा अंदाज़ मेरी कलात्मक पसंद होती थी। “अब भाई मोर खाली चक्का च ला चलात थोड़ी रबो ओकरे सती हमन चिरई घलो मारे ला जात रहे हन,इमली घलो तोड़न, बोइर घलो तोड़न,तब तो दूर-दूर चक्का चलाएक जा के कोई मतलब बनहि ओखरे पायके गुलेन ला घरो चक्का मा खोच देवत रहेन”। चक्के में गुलेन को फंसा दिया करते थे जिसे हम पंछियो पर तो कभी किस वस्तु पर निशाना साधते थे। चक्का चलाना केवल खेल नहीं था इससे आप के शरीर की क्षमता पता चलती थी कि आप गर्मियों की कड़ी धूप में नंगे पांव कितनी दूर और कब तक टिक पाते हो, बचपन के इस तरह के खेल से मेरा शरीर काफ़ी कठिला हो गया था। इन खेलों से आप का शरीर मजबूत भी होता है जब आप बिना सोचे कितनो किलोमीटर आप युही दौड़ दिया करते थे। इस तरह के खेल विलुप्त हो चुके है। दूर तक कही घूम कर आने के बाद गलियों में एक ऐसी जगह होती थी जो नीम,पीपल या करन के वृक्ष की छांव में होती उस जगह हम रुकते और शाम होने तक वहीं रहते। हम उन पेड़ो की छाओ में नहीं बल्कि पेड़ो पर ही अपना समय गुज़ारते। मेरा पसंदीदा पेड़ उनदिनों करन का हुआ करता था क्यों कि वह पेड़ उचाई में ज्यादा बड़ा नही होता है और खास बात की उस पेड़ को खरोच कर आप कुछ उकेरते हो तो वह कुछ दिनों बाद उभर जाता है। इसी कारण हम सब दोस्त मिल कर अपनी अपनी पसंदीदा टहनियों में बैठ जाते और अपना नाम उकेरने लग जाते फिर उसे कुछ दिनों बाद जब देखने जाते तो हमारा नाम भी अब उस पेड़ का हिस्सा बन चुका होता। शाम होते ही हम सब थक चुके होते और सीने में एक डर लिए घर की ओर जाते ये डर इस बार माँ के डांटने का नही है डर अब इस बात का होता था कि अब हमें जो गर्मियों की छुट्टियों में होमवर्क करने को दिया गया है उसे करने बैठना है माँ भी बड़े प्यार से कहती, “कि चल अब दिन भर खेले किंजरे हस ते चल अब चुप चाप पढ़े ला बइठ नही तो फेर मैं तोर पाप ला बताहु अभी आवत हो ही उहू हा”,बस यहां से उदासीनता शुरू हो जाती जब तक होमवर्क खत्म नही होता।औऱ फ़िर समय आता टी.वी देखने का जिसमे,” मोला टेटकू-मेटकु(कार्टून) देखे में अब्बड़ मजा लागता भाई”।

इन बिताए गए बचपन के यादगार खुशनुमा पल अब वापिस नहीं आ सकते इस से जुड़ी यादे बहुत है इस कहनीं मे जो मेरे साथ हुआ करते थे सब की ज़िंदगी भी बदल गई हैं लेकिन बस ये यादे रह गई हैं अपनी इन बातों से मैंने इन्हें फिर से ज़िन्दा करने की कोशिश की आगे और भी कहानियां है बचपन की जिन्हें इसी तरह शब्दो मे पिरोता रहूंगा।

फ़र्क पड़ता है यारों

कोई जा के कहदो यारों उससे

भूला नही हूं मैं उसे ,

हा मैं करता हूं नज़रंदाज उसे

पर तड़पता भी हूं मैं उसके लिए ,

करता हूं दिखावा भूल जाने का जैसे कोई फ़र्क न पड़ रहा हो मुझे पर,

फ़र्क पड़ता है यारों कोई जा के कहदो उससे

खुद को किसी और की ओर बहने नही देता

ये अकेलापन मुझे चैन से जीने नहीं देता ,

ख्वाहिश ऐसे जगा गई हो तुम कि बिना मौसिकी के अब रहा नही जाता ,

यारों कोई फिर से मिलादो मुझे उससे

लगता है आज भी कही से रखी है तुमने नज़र मुझ पर इसलिए करीब कोई और आती नहीं है नज़र

कोई जाके कहदो यारों उससे आज भी ढूंढती है उसको मेरी नज़र

खींचा-खींचा दो तरफा हो गया हूं ,न पार होता हूं न डूब सकता हूं बस बिन पानी मछली सा हो गया हूं ,

कोई जा के कहदो यारो उससे ,

इंतज़ार में उसके प्यासा बैठा हूं मैं

इंतज़ार में उसके प्यासा बैठा हूं मैं

#नागेन्द्र#प्रेम#स्नेह#ख़ुशी

उलझन

लो फिर वो वक़्त आया वो जाने को थी

मैं ठहरा सा था ।

वो अलविदा कहने को थी,मैं रुक जाने को था।

उसे समझ ना थी,मैंने न समझाना चाहा ।

उसे एहसास न हुआ, मैं ख़ामोश रह गया ।

वो बेपरवाह आज़ाद परिंदा थी, मैं उसका ठिकाना न हुआ ।

वो तो पहले से ही कहीं थी गुम, मैं उसमे गुम होना चाहता था ।

वो तो सतरंगी इन्द्रधनुषी थी,मैं गुमनाम बदरंग बादल था ।

बातों से दिल के मेरे वाकिफ़ सभी थे,इस बात का पता न उसको था न मुझको था ।

करीब तो थे मगर कोसो दूर भी थे ।

आदत तो थी इसकी इस तरह होने की, मगर चाहने का ये फ़ितूर कम ना हो पाया ।

तालाश मुझको ख़ुश-ख़ुशी की थी, हस-हंसी भी मिली ।

मग़र इस क़ाबिल तो कभी मैं ही न था ।

एक और इश्क़ सिमट गया

एक और कहानी दफ़न हुई

Image Source Google

सफ़रनामा

यह किसी के साथ भी हुआ होगा

अक्सर यह देखने में आता है कि रेल में यात्रा के दौरान महिलायें बैठने के लिए सीठ का जुगाड़ कर ही लेती है

मैं अपने घर के लिए वर्धा से दुर्ग के लिए सुबह 9.38 की ट्रेन से चल पड़ा । मुझे मेरी सीठ मिल गई ट्रेन समय से पहले चल रही थी इस वजह से नागपुर पहुंचते ही ट्रेन लगभग आधा घंटा और वह खड़ी हो गई मेरे सामने एक महिला सोई हुई थी थोड़ी देर बाद वह उठ गई और कुछ समय बीतने के बाद वह अपने पति से सीठ को लेकर कुछ बात करने लगी उनकी भाषा मुझे समझ नहीं आ रही थी लेकिन इतना समझ मे आगया था कि वह दोनो सीठ को लेकर कुछ बात कर रहे थे । इस भीच वह महिला फ़्रेश हो कर आई और सीठ पर बैठे हम लोगो से सवाल किया कि क्या आप लोगो की यह पर कोई सीठ है ? मैंने कहा जी हां मेरी सीठ है यहा पर, महिला बोली क्या आप आगे वाले सीठ नम्बर 9 पर जा के बैठ जाएंगे, मैंने पूछा कि सीठ लोअर , मिडिल है या ऊपर है जवाब में महिला ने कहा लोअर सीठ है जवाब सुनते ही मैंने हामी भर दी। इनका परिवार मूल रूप से दक्षिणा भारत से था जो अपने पति और एक बेटे के साथ सफर कर रहा था। जहा इनका महिला का बेटा बैठा था वह मुझे जाने को कहा गया था।

इसी के साथ वही पर एक और महिला विराजमान थी शायद इनका सीठ कन्फर्म नही हुआ था इस वजह से वह एडजस्ट कर वही बैठी हुई थीं । ये महिला मेरे क्षेत्र से थीं गांव से होने की वजह से वह थोड़ी संकोच के साथ बैठी थी क्यों कि उनका अपना सीठ नही था।

ये दोनों महिला एक ही सीठ पर बौठे थे मेरे क्षेत्र की महिला के पति यहां वहा कही वो भी खड़े खड़े एडजस्ट करते नज़र आ रहे थे वहीं दक्षिण भारत की महिला अपने पति के साथ ही बैठीं थी । इन्हों ने खाना मंगाया और पति खाना खाने लगा और पत्नी इंतज़ार करने लगी,कुछ देर बाद पति के खाना खत्म कर देने के बाद पति अपने बेटे को बुला लाया ऐसा इसलिए क्यों कि अब तक मैन सीठ बदली नही थी और उनका बेटा वही दूसरी सीठ पर ही बौठा था । अब वह भी यहां आगया और पिता अपने बेटे की सीठ पर जा कर बैठ गए।

इन सब के बीच मेरे क्षेत्र की महिला को वह सीठ छोडनी पड़ी इससे पहले मेरे बाजू में बैठे एक बुज़ुर्ग उठ के कही चल दिये इस वजह से उस महिला मेरे बाजू में बैठने का मौका मिल गया।

उधर उस सीठ में महिला अपने बेटे को खाना परोसा चुकी थी और वह खाना खाने लगा और वह महिला अपने बेटे को खाना खाते निहारते बातें करने लगी मुझे उनकी भाषा समझ मे नही आ रही थी इसलिए न जाने वो क्या बात कर रहे थे ख़ैर, मेरे बाजू में बैठी महिला काफी समय से नींद के साथ संघर्ष कर रही थी बैठे बैठे ही सो गई इस बीच अचानक वह लुड़क कर मेरी ओर लेट गई मै थोड़ा और सरक कर उससे सोने के लिए थोड़ी जगह दे दी ।अब यह महिला आराम से सो चुकी हैं।

सामने वाली सीठ में बेटे के खाने के बाद महिला ने उसी थाली में से बेटे द्वारा छोड़े गए खाने को वह खाने लगी यह पहले से तय था कि बेटा थोड़ा खायेगा ओर फिर माँ उसी मेसे थोड़ा खायेगी। खाना खाने कर बाद दोनों माँ बेटे सो गए बेटा मिडिल वाली सीठ पर और माँ लोअर सीठ में ।

नींद तो मिझे भी आ रही थी पर मैं कैसे उस महिला को अब उठा दूं जो भारी नींद में सो रही है वही दक्षिण भारतीय महिला के पति को भी तो नींद आ रही होगी लेकिन उनके बाजू भी कोई महिला विराजी हुईं है।

महिलाओं को इन सब में सुविधा हों ही जाती है ना जाने कब हमे कोई इस तरह से ट्रीट करेगा ।तो बस ये ही था सफर जो अब भी जारी है।

हाय तौबा नींद….👍

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